Friday, July 5, 2013

बस दो पंक्तियाँ--- "जब भी मेरी उनसे निगाहें मिलती है

बस दो पंक्तियाँ---

"जब भी मेरी उनसे निगाहें मिलती है
सच मानिये मेरी तबीयत बदलती है

ना जाने नशा कैसा दिल में उतरता है
आँखों के सामने मेरे हर रात मरती है।" 

-शशिष कुमार तिवारी
(8.29pm, 5th July 2013 at Patna)

Thursday, May 30, 2013

महक कलियों की फूलों की हँसी अच्छी नहीं लगती
बिना उनके हमें ये ज़िंदगी अच्छी नहीं लगती

ज़रा-सी ठेस लगने से छलक पड़ते हैं क्यूँ आँसू
हमेशा आँख में इतनी नमी अच्छी नहीं लगती

कभी तो अब्र बनकर झूमकर निकलो कहीं बरसों
कि हर मौसम में ये संजीदगी अच्छी नहीं लगती

मुहब्बत के सफ़र में रुत भी आती है जुदाई की
हमें उस वक़्त कोई भी ख़ुशी अच्छी नहीं लगती

भले मिल जाए दौलत और शोहरत हमको दुनिया में
मगर दिल को मुहब्बत की कमी अच्छी नहीं लगती

मुझे तो साथ तेरे ज़िंदगी ! अच्छा लगे जीना
भले दुनिया को अपनी दोस्ती अच्छी नहीं लगती

......देवमणि पांडेय की ग़ज़ल.....
(फोटो : जगजीत सिंह के साथ आख़िरी मुलाक़ात...उन्हें यह ग़ज़ल पसंद थी।)
दिल्ली की उर्दू पत्रिका आजकल में देवमणि पांडेय की ग़ज़ल

इस जहाँ में प्यार महके ज़िंदगी बाक़ी रहे
ये दुआ माँगो दिलों में रोशनी बाक़ी रहे

आदमी पूरा हुआ तो देवता हो जायेगा
ये ज़रूरी है कि उसमें कुछ कमी बाक़ी रहे

दोस्तों से दिल का रिश्ता काश हो कुछ इस तरह
दुश्मनी के साये में भी दोस्ती बाक़ी रहे

दिल के आंगन में उगेगा ख़्वाब का सब्ज़ा ज़रूर
शर्त है आँखों में अपनी कुछ नमी बाक़ी रहे

इश्क़ जब कीजे किसी से दिल में ये जज़्बा भी हो
लाख हों रुसवाइयाँ पर आशिक़ी बाक़ी रहे

दिल में मेरे पल रही है यह तमन्ना आज भी
इक समंदर पी चुकूँ और तिश्नगी बाक़ी रहे

(Aajkal Februry 2013)


देवमणि पांडेय जी की ये ग़ज़ल मुझे बहुत पसंद है .... शुक्रिया!!!