Thursday, May 30, 2013

महक कलियों की फूलों की हँसी अच्छी नहीं लगती
बिना उनके हमें ये ज़िंदगी अच्छी नहीं लगती

ज़रा-सी ठेस लगने से छलक पड़ते हैं क्यूँ आँसू
हमेशा आँख में इतनी नमी अच्छी नहीं लगती

कभी तो अब्र बनकर झूमकर निकलो कहीं बरसों
कि हर मौसम में ये संजीदगी अच्छी नहीं लगती

मुहब्बत के सफ़र में रुत भी आती है जुदाई की
हमें उस वक़्त कोई भी ख़ुशी अच्छी नहीं लगती

भले मिल जाए दौलत और शोहरत हमको दुनिया में
मगर दिल को मुहब्बत की कमी अच्छी नहीं लगती

मुझे तो साथ तेरे ज़िंदगी ! अच्छा लगे जीना
भले दुनिया को अपनी दोस्ती अच्छी नहीं लगती

......देवमणि पांडेय की ग़ज़ल.....
(फोटो : जगजीत सिंह के साथ आख़िरी मुलाक़ात...उन्हें यह ग़ज़ल पसंद थी।)

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